अभी राजस्थान के गंगानगर में 13 वर्षीय अबोध बालिका के साथ 5 दिन में 32 लोगों द्वारा किया गया अनवरत अमानुषिक अत्याचार को किस श्रेणी में रखा जाए, ये एक बेहद सोचनीय विषय है। सामाजिक मूल्यों के पतन की पराकाष्ठा और कितनी गर्त में जाएगी? इस प्रकरण ने हर उस इंसान को जिसके हृदय है और धड़कता है विषाद से भर दिया है। उस निरीह बालिका की अनसुनी चीत्कार कानों में चीख चीख कर कह रही है कि क्या लड़की होना ही मेरा अपराध है। ह्यूमन ट्रैफिकिंग और 5 दिन तक हर होटल में बिकता जिंदा गोश्त और नोचते गिद्ध, क्या पुलिस को इसकी भनक भी नहीं लगी? सैकड़ों मील दूर बैठकर जब इस घटना मात्र से शरीर में सिहरन होती है तो उस पर क्या बीती होगी।
पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया और भी हो ही जाएंगे, फिर लाचार न्याय व्यवस्था का वही पुराना सिलसिला चलेगा, जांच होगी, चार्जशीट होगी, गवाही, तारीख के चक्रव्यूह में न्याय रूपी अभिमन्यु फंस जाएगा। कुछ को जमानत मिल जाएगी। 10-20 साल बाद कुछ अपराधी सबूतों के अभाव में बरी हो जाएंगे, कुछ मर खप जाएंगे, कुछ को सजा मिलेगी, लोग भूल जाएंगे। फिर इंतजार होगा किसी और नई घटना का। न्याय मिलेगा लेकिन किस बात का क्या होटल के कमरे में दीवारों से टकराती चीखों का, या अट्टहास करती उस हैवानियत का या उन धन्ना सेठों के पाप का जो जिन्दा गोश्त को गिद्धों को परोसने का कुकृत्य करते हैं। न्याय तो होगा पर एक कहावत है Delayed Justice is Unjutice. क्या सरकार इस तरह के अपराधों पर प्रभावी अंकुश के लिए कुछ करेगी या घड़ियाली आंसू ही बहाएगी। मुगले आजम फिल्म का एक गीत था “मौत वही जो दुनिया देखे” मैं तो कहता हूं कि “सजा वही जो दुनिया देखे”। लोग ऐसे कृत्य करने से पहले सौ बार सोचें।