फिरोजाबाद। डेढ़ साल के मासूम आरव की निर्मम हत्या ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। अब इस दिल दहला देने वाले हत्याकांड में जिला एवं सत्र न्यायाधीश डॉ. बब्बू सारंग ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इसे “दुर्लभतम से दुर्लभ (Rarest of Rare)” श्रेणी का अपराध माना है। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इतने जघन्य, वीभत्स, सुनियोजित और क्रूर अपराध में मृत्युदंड से कम कोई भी सजा न्याय के उद्देश्य के विपरीत होगी। यह फैसला केवल एक अपराधी को सजा देने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज को यह संदेश भी दे गया कि मासूम बच्चों के खिलाफ दरिंदगी करने वालों के लिए कानून में कोई नरमी नहीं हो सकती।
मासूम की हत्या ने झकझोर दी थी इंसानियत
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि डेढ़ साल के मासूम आरव की जिस तरह जमीन पर पटक-पटककर बेरहमी से हत्या की गई, वह मानवता को शर्मसार करने वाली घटना है। यह अपराध इतना भयावह था कि प्रत्यक्षदर्शी भी दहशत में आ गए और किसी की हिम्मत नहीं हुई कि आरोपी को रोक सके। न्यायालय ने कहा कि दोषी विराज पाठक रिश्ते में बच्चे का चाचा था। जिस व्यक्ति पर बच्चे की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी, उसी ने विश्वास को तार-तार करते हुए मासूम की जान ले ली।
“बिना किसी उकसावे के, ठंडे दिमाग से किया गया अपराध”
फैसले में अदालत ने कहा कि यह हत्या किसी अचानक हुए विवाद का परिणाम नहीं थी, बल्कि पूरी तरह सुनियोजित थी। आरोपी ने बच्चे की मां से विवाह करने की अपनी इच्छा में बाधा बनने पर मासूम को रास्ते से हटाने की साजिश रची और उसे बेहद क्रूर तरीके से मौत के घाट उतार दिया। न्यायालय ने कहा कि यह अपराध बिना किसी उकसावे के, पूरी योजना और ठंडे दिमाग से किया गया। इसकी क्रूरता को किसी भी दृष्टि से कम नहीं आंका जा सकता।
“अगर नरमी बरती गई तो परिवार पर जीवनभर रहेगा खतरा”
जिला न्यायाधीश ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यदि आरोपी के प्रति किसी प्रकार की नरमी बरती जाती है तो इससे आरव की मां और उसके पूरे परिवार पर जीवनभर खतरा बना रहेगा। इस घटना ने केवल एक परिवार को नहीं, बल्कि पूरे समाज को भय और असुरक्षा की भावना से भर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे अपराधों में कठोरतम दंड ही समाज में कानून के प्रति विश्वास बनाए रख सकता है।
फैसला सुनाते समय बचाव पक्ष भी रहा निरुत्तर
शुक्रवार को जैसे ही अदालत में सजा सुनाने की प्रक्रिया शुरू हुई, न्यायालय परिसर में भारी भीड़ जुट गई। दोपहर करीब ढाई बजे जिला जज ने फैसला पढ़ना शुरू किया। फैसले से पहले न्यायाधीश ने कई बार बचाव पक्ष के अधिवक्ता से पूछा कि उनके पक्ष में क्या कहना है, लेकिन बचाव पक्ष कोई ठोस जवाब नहीं दे सका। हर बार केवल इतना कहा गया कि जो रिकॉर्ड पर है वही कहा जा चुका है। स्वयं दोषी विराज पाठक भी अपने बचाव में कोई विशेष आधार प्रस्तुत नहीं कर सका।
“जैसे मेरे बेटे को तड़पाकर मारा… वैसे ही वह भी मरे”
फैसले की जानकारी मिलते ही आरव की मां रति की आंखों से आंसू छलक पड़े। वह स्वास्थ्य खराब होने के कारण अदालत नहीं पहुंच सकी थीं और गांव में ही थीं। फोन पर सजा की सूचना मिलने के बाद वह भावुक होकर रो पड़ीं। उन्होंने कहा—”मेरे बेटे को जिस तरह तड़पा-तड़पाकर मारा गया, अब उसे भी उसके किए की पूरी सजा मिले। बेटे की मौत के बाद मेरे मन में केवल यही इच्छा थी कि हत्यारे को फांसी मिले। आज अदालत ने न्याय किया है।”
नानी बोलीं—”मेरा बच्चा गया है, कोई बकरी का बच्चा नहीं था”
आरव की नानी पिंकी शर्मा भी फैसले के बाद बेहद भावुक हो गईं। उन्होंने कहा—”विराज ने हमारे विश्वास को तोड़ा है। उसे उसके किए की सजा मिली है। यदि वह हाईकोर्ट जाएगा तो वहां भी पूरी मजबूती से पैरवी करेंगे। मेरा बच्चा गया है, कोई बकरी का बच्चा नहीं था। मैं उसे भी उसके अंजाम तक पहुंचते देखना चाहती हूं।”
गांव में भी फैसले का स्वागत
फैसले के बाद गांव और आसपास के क्षेत्र में भी लोगों ने अदालत के निर्णय का स्वागत किया। ग्रामीणों का कहना था कि इस फैसले से कानून पर लोगों का भरोसा और मजबूत हुआ है। उनका मानना है कि मासूमों के खिलाफ ऐसे जघन्य अपराध करने वालों को कठोरतम सजा मिलनी ही चाहिए, ताकि भविष्य में कोई ऐसी दरिंदगी करने की हिम्मत न कर सके। आरव हत्याकांड का फैसला केवल एक मुकदमे का अंत नहीं है, बल्कि यह उन सभी अपराधियों के लिए सख्त चेतावनी है जो मासूम बच्चों के खिलाफ अपराध करने की सोचते हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि विश्वासघात, सुनियोजित हत्या और मासूम की निर्मम हत्या जैसे अपराधों में कानून की नजर में किसी भी प्रकार की नरमी की कोई जगह नहीं है।