आगरा। ताजनगरी आगरा के बिजलीघर स्थित सुभाष बाजार में बुधवार दोपहर हुआ हादसा केवल एक दुकान के ढहने की घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, जर्जर सरकारी संपत्तियों की अनदेखी और चेतावनियों को नजरअंदाज करने की गंभीर तस्वीर बनकर सामने आया है। महज 10 सेकेंड में नाले पर बनी दो मंजिला कपड़े की दुकान भरभराकर करीब 20 फीट गहरे महावीर नाले में समा गई। दुकान के अंदर मौजूद लोग और बाहर से गुजर रहे राहगीर मलबे के साथ नाले में जा गिरे। पूरे बाजार में अफरा-तफरी और चीख-पुकार मच गई। हादसे के बाद स्थानीय व्यापारी और आसपास के लोग अपनी जान जोखिम में डालकर नाले में उतर गए। रस्सियों और सीढ़ियों के सहारे लोगों को बाहर निकालने का प्रयास शुरू हुआ। बाद में पुलिस, फायर ब्रिगेड और एसडीआरएफ की टीम मौके पर पहुंची और संयुक्त रूप से रेस्क्यू अभियान चलाया गया। चार लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, जबकि 60 वर्षीय गंगा देवी की तलाश देर रात तक जारी रही।
खरीदारी करने आई थीं, हादसे की चपेट में आ गईं
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार दोपहर करीब 2:30 बजे राधास्वामी क्लॉथ सेंटर में दुकान संचालक तुलाराम, उनके परिजन और कर्मचारी मौजूद थे। उसी समय लखनऊ निवासी महिला सिपाही अनीता अपनी डेढ़ वर्षीय बेटी अनन्या और अपनी 60 वर्षीय मां गंगा देवी के साथ खरीदारी के लिए बाजार पहुंची थीं। तभी अचानक तेज धमाके जैसी आवाज हुई और पूरी दुकान नाले में धंस गई। कुछ ही सेकेंड में पूरा ढांचा मलबे में बदल गया।
एक महीने पहले ही दी गई थी लिखित चेतावनी
इस हादसे का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि सुभाष बाजार व्यापार समिति ने करीब एक महीने पहले नगर निगम को लिखित ज्ञापन देकर स्पष्ट रूप से चेतावनी दी थी कि नाले के ऊपर बने स्लैब और दुकानें जर्जर हो चुकी हैं। व्यापारियों ने मांग की थी कि या तो नगर निगम तत्काल मरम्मत कराए या फिर दुकानदारों को अपने खर्च पर मरम्मत की अनुमति दी जाए। व्यापारियों का आरोप है कि शिकायत के बावजूद न तो तकनीकी निरीक्षण कराया गया और न ही कोई मरम्मत हुई। यदि समय रहते कार्रवाई की जाती, तो शायद यह हादसा टाला जा सकता था।
हादसे के बाद बाजार में दहशत
दुकान गिरने की खबर फैलते ही पूरे सुभाष बाजार और आसपास के व्यापारिक क्षेत्रों में दहशत फैल गई। कई व्यापारियों ने एहतियात के तौर पर अपनी दुकानें बंद कर दीं। लोगों ने नकदी और जरूरी सामान निकालकर बाजार खाली करना शुरू कर दिया। आशंका जताई जाने लगी कि कहीं अन्य जर्जर दुकानें भी हादसे का कारण न बन जाएं।
स्थानीय लोग बने असली हीरो
हादसे के तुरंत बाद सबसे पहले स्थानीय दुकानदार और आसपास के युवक नाले में उतरे। बिना अपनी जान की परवाह किए उन्होंने मलबे में फंसे लोगों को निकालना शुरू किया। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में स्थानीय लोग रस्सियों और सीढ़ियों के सहारे लोगों को बाहर निकालते दिखाई दे रहे हैं। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि यदि शुरुआती मिनटों में स्थानीय लोग मदद के लिए आगे नहीं आते, तो स्थिति और भयावह हो सकती थी।
नगर आयुक्त का बयान
घटना के बाद नगर आयुक्त संतोष कुमार वैश्य ने कहा कि शहर में नगर निगम की सभी जर्जर संपत्तियों और नालों पर बनी दुकानों का सर्वे कराया जाएगा। जहां भी भवन या दुकानें असुरक्षित पाई जाएंगी, वहां नोटिस जारी कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। हालांकि स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि यह सर्वे हादसे से पहले होना चाहिए था, न कि हादसे के बाद।
व्यापारियों ने घेरा नगर आयुक्त
हादसे के बाद मौके पर पहुंचे नगर आयुक्त को व्यापारियों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। लोगों ने नगर निगम के खिलाफ नारेबाजी की और आरोप लगाया कि बार-बार शिकायत करने के बावजूद किसी अधिकारी ने उनकी बात नहीं सुनी। व्यापारियों का कहना था कि यदि प्रशासन ने समय रहते चेतावनी को गंभीरता से लिया होता तो आज किसी परिवार पर यह संकट नहीं आता।
सबसे बड़ा सवाल—क्या हर बार हादसे के बाद ही जागेगा प्रशासन?
आगरा में हर बारिश के बाद जलभराव, जर्जर नाले, टूटती सड़कें और धंसती संरचनाएं चर्चा का विषय बनती हैं। शिकायतें होती हैं, ज्ञापन दिए जाते हैं, अधिकारी आश्वासन देते हैं, लेकिन स्थायी समाधान नजर नहीं आता। जब तक कोई बड़ा हादसा नहीं होता, तब तक व्यवस्था में कोई हलचल दिखाई नहीं देती। आज सवाल सिर्फ एक दुकान का नहीं है। सवाल यह है कि शहर में नालों पर बनी कितनी दुकानें, कितने मकान और कितनी सरकारी संरचनाएं अभी भी खतरे की स्थिति में हैं? क्या उनका सर्वे समय रहते होगा या फिर प्रशासन किसी अगले हादसे का इंतजार करेगा? सुभाष बाजार का यह हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है कि यदि जर्जर संरचनाओं की समय रहते पहचान और मरम्मत नहीं की गई, तो भविष्य में इससे भी बड़े हादसे हो सकते हैं। अब निगाहें इस बात पर हैं कि जांच के बाद जिम्मेदारी किसकी तय होती है और क्या वास्तव में दोषियों पर कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी कुछ दिनों की सुर्खियों के बाद फाइलों में दबकर रह जाएगा।
क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही प्रशासन की आंखें खुलती हैं? क्या शिकायतें सिर्फ फाइलों में दबाने के लिए होती हैं? क्या आम लोगों की जान की कीमत तब समझ आती है, जब कोई मलबे में दब जाता है? आगरा के बिजलीघर स्थित सुभाष बाजार में हुआ हादसा इन्हीं सवालों को फिर से खड़ा कर गया है। बुधवार दोपहर करीब 2:30 बजे महज 10 सेकेंड में नाले पर बनी दो मंजिला राधास्वामी क्लॉथ सेंटर की दुकान भरभराकर करीब 20 फीट गहरे नाले में समा गई। दुकान के अंदर मौजूद लोग और खरीदारी के लिए आए ग्राहक सीधे मलबे के साथ नाले में जा गिरे। पूरे बाजार में चीख-पुकार मच गई। हादसे में दुकान संचालक, कर्मचारी और वहां से गुजर रहे लोग मलबे में दब गए। रेस्क्यू ऑपरेशन चलाकर चार लोगों को बाहर निकाल लिया गया, लेकिन 60 वर्षीय गंगा देवी का देर रात तक भी कोई पता नहीं चल सका। एसडीआरएफ, फायर ब्रिगेड, पुलिस और स्थानीय लोगों ने घंटों तक राहत एवं बचाव अभियान चलाया।
एक महीने पहले दी गई थी चेतावनी, फिर भी नहीं जागा सिस्टम
इस हादसे का सबसे गंभीर पहलू यह है कि व्यापारियों ने करीब एक महीने पहले नगर निगम को लिखित ज्ञापन देकर चेतावनी दी थी कि नाले पर बनी दुकानें और स्लैब जर्जर हो चुके हैं। बारिश में बड़ा हादसा हो सकता है। यदि नगर निगम मरम्मत नहीं कर सकता तो दुकानदारों को स्वयं मरम्मत की अनुमति दी जाए। व्यापारियों का आरोप है कि शिकायत के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यदि समय रहते मरम्मत या सर्वे कराया गया होता तो शायद यह हादसा टाला जा सकता था।
10 सेकेंड में उजड़ गई जिंदगी
दुकान पर मौजूद तुलाराम ने अस्पताल में बताया कि अचानक दुकान हिलने लगी। कुछ समझ पाते, उससे पहले पूरा ढांचा नाले में समा गया। मलबा उनके ऊपर आ गिरा। उन्हें लगा कि अब बचना मुश्किल है। कुछ देर बाद स्थानीय लोगों ने मलबा हटाकर उन्हें बाहर निकाला।
स्थानीय लोग बने असली हीरो
हादसे के तुरंत बाद सबसे पहले स्थानीय व्यापारी और आसपास के लोग जान जोखिम में डालकर 20 फीट गहरे नाले में उतरे। रस्सियों और सीढ़ियों के सहारे लोगों को बाहर निकालने का प्रयास शुरू किया गया। बाद में पुलिस, फायर ब्रिगेड और एसडीआरएफ की टीम मौके पर पहुंची।
हादसे के बाद जागा प्रशासन
घटना के बाद जिलाधिकारी मनीष बंसल, अपर पुलिस आयुक्त, डीसीपी सिटी सहित कई अधिकारी मौके पर पहुंचे। नगर आयुक्त ने शहरभर में नगर निगम की जर्जर संपत्तियों और नालों पर बनी दुकानों का सर्वे कराने की बात कही। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सर्वे हादसे से पहले नहीं हो सकता था?
व्यापारियों का फूटा गुस्सा
नगर आयुक्त के मौके पर पहुंचते ही व्यापारियों का गुस्सा फूट पड़ा। लोगों ने नगर निगम के खिलाफ नारेबाजी की और आरोप लगाया कि लगातार शिकायतों के बावजूद अधिकारियों ने कोई ध्यान नहीं दिया। उनका कहना था कि अगर समय रहते कार्रवाई होती तो आज यह हादसा नहीं होता।
सबसे बड़ा सवाल
– आखिर हर बार हादसे के बाद ही जांच समिति क्यों बनती है?
– जब व्यापारियों ने पहले ही लिखित शिकायत दी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
– जर्जर दुकानों का सर्वे पहले क्यों नहीं कराया गया?
– क्या प्रशासन किसी बड़ी जनहानि का इंतजार कर रहा था?
– अगर वहां अधिक भीड़ होती तो क्या मौतों का आंकड़ा कहीं बड़ा नहीं होता?
– क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी या फिर यह मामला भी कुछ दिनों बाद ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
आगरा जैसे ऐतिहासिक और व्यस्त शहर में यदि नालों पर बनी जर्जर दुकानों की स्थिति पहले से प्रशासन के संज्ञान में थी, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
यह सवाल सिर्फ सुभाष बाजार का नहीं, बल्कि पूरे शहर की सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर खड़ा होता है। अब देखने वाली बात होगी कि इस हादसे की जांच में क्या निष्कर्ष निकलते हैं, लापरवाही किस स्तर पर पाई जाती है और भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए कौन-कौन से ठोस कदम उठाए जाते हैं।