आगरा। कुछ जीतें सिर्फ पदक नहीं होतीं, बल्कि करोड़ों लोगों के लिए उम्मीद की नई रोशनी बन जाती हैं। आगरा के पैरा एथलीट जतिन कुशवाहा की कहानी भी ऐसी ही है। जन्म से मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे जतिन के लिए सामान्य रूप से चलना-फिरना भी आसान नहीं है, लेकिन उन्होंने अपनी कमजोरी को कभी हार का कारण नहीं बनने दिया। जिस बीमारी को लोग अभिशाप मानते हैं, उसे जतिन आज भी “गॉड गिफ्ट” कहते हैं।
मिस्र की राजधानी काइरो में आयोजित वर्ल्ड बोच्चिया (Boccia) चैलेंज सीरीज में जतिन ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक जीतकर आगरा ही नहीं, पूरे भारत का नाम अंतरराष्ट्रीय मंच पर रोशन कर दिया। उनकी इस उपलब्धि के बाद शहर में खुशी की लहर है और हर कोई इस जांबाज खिलाड़ी के जज्बे को सलाम कर रहा है।
“मेरे लिए मस्कुलर डिस्ट्रॉफी कोई समस्या नहीं, यह भगवान का दिया हुआ उपहार है”
जतिन कुशवाहा कहते हैं—
«”मैं अपनी मस्कुलर डिस्ट्रॉफी बीमारी को प्रॉब्लम नहीं मानता। मेरे लिए यह गॉड गिफ्ट है। शायद इसी की वजह से मैं इस खेल तक पहुंच पाया और आज देश के लिए मेडल जीत रहा हूं।”»
उनकी यह सोच ही उन्हें लाखों लोगों से अलग बनाती है। जहां अधिकांश लोग मुश्किलों के आगे घुटने टेक देते हैं, वहीं जतिन ने अपनी शारीरिक चुनौतियों को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया।
चलने में परेशानी, लेकिन हौसले आसमान से भी ऊंचे
आगरा के कमला नगर निवासी तीरथ सिंह कुशवाहा के चार बच्चों में सबसे बड़े जतिन जन्म से ही मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से पीड़ित हैं। उनके पिता का जूते का कारोबार है। शारीरिक कमजोरी के कारण रोजमर्रा के कई काम भी उनके लिए चुनौती बन जाते हैं, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
जतिन कहते हैं कि दिव्यांग व्यक्ति के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल शरीर नहीं होता, बल्कि समाज की सोच और परिस्थितियां भी होती हैं। चीजों को स्वीकार करना, खुद को संभालना और छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करना भी कठिन होता है, लेकिन जिंदगी का असली नाम इन्हीं मुश्किलों से लड़कर आगे बढ़ना है।
कॉमर्स में पोस्ट ग्रेजुएट, एमबीए और फुटवियर डिप्लोमा धारक
खेल के साथ-साथ पढ़ाई में भी जतिन ने शानदार उपलब्धियां हासिल की हैं। वह कॉमर्स में पोस्ट ग्रेजुएट, एमबीए और फुटवियर टेक्नोलॉजी में डिप्लोमा धारक हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि शारीरिक चुनौतियां कभी भी प्रतिभा और मेहनत को रोक नहीं सकतीं।
सिर्फ तीन-चार दिन की प्रैक्टिस… और पहली ही नेशनल में गोल्ड
जतिन बताते हैं कि जब उन्होंने पहली बार बोच्चिया खेल के बारे में जाना तो उनके भीतर इसे खेलने की जिद पैदा हुई। उन्होंने मात्र तीन-चार दिन अभ्यास किया और दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय प्रतियोगिता में उतर गए।
नतीजा चौंकाने वाला था।
पहली ही राष्ट्रीय प्रतियोगिता में उन्होंने एक स्वर्ण और एक कांस्य पदक जीत लिया। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। लगातार चार वर्षों से राष्ट्रीय स्तर पर सिंगल और डबल दोनों वर्गों में पदक जीतते आ रहे हैं।
मिस्र में लहराया तिरंगा, पांच में चार मुकाबले जीते
काइरो में आयोजित वर्ल्ड बोच्चिया चैलेंज सीरीज में जतिन ने कुल पांच मुकाबले खेले, जिनमें चार में शानदार जीत दर्ज की।
उन्होंने स्पेन और क्रोएशिया के खिलाड़ियों को हराकर शानदार शुरुआत की। इसके बाद हांगकांग के खिलाड़ी को मात देकर पदक की दावेदारी मजबूत कर ली। अंतिम मुकाबले में स्लोवेनिया के खिलाड़ी से बेहद मामूली अंतर से हारने के बावजूद उन्होंने कांस्य पदक अपने नाम किया।
उनकी इस उपलब्धि से पूरे आगरा में खुशी का माहौल है और उनके स्वागत की तैयारियां शुरू हो गई हैं।
तीन देशों में खेल चुके हैं, कई अंतरराष्ट्रीय पदक जीत चुके हैं
जतिन अब तक चीन, हांगकांग, बहरीन और मिस्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
2024 में बहरीन में आयोजित प्रतियोगिता में उन्होंने सिंगल वर्ग में कांस्य और डबल वर्ग में रजत पदक जीता। यह उनकी कैटेगरी का भारत के लिए पहला अंतरराष्ट्रीय सिंगल पदक था।
वह एशियन पैरा गेम्स में भी भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए पदक जीत रहे हैं।
क्या है बोच्चिया खेल?
बोच्चिया एक पैरालंपिक खेल है, जो विशेष रूप से गंभीर शारीरिक दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए बनाया गया है। यह खेल 12.5×6 मीटर के समतल कोर्ट पर खेला जाता है।
इसमें तीन रंगों की गेंदें होती हैं—
– सफेद (जैक बॉल)
– लाल
– नीली
खिलाड़ियों का लक्ष्य अपनी गेंद को जैक बॉल के सबसे करीब पहुंचाना होता है। जितनी नजदीक गेंद होगी, उतने अधिक अंक मिलते हैं।
यह खेल 1984 से पैरालंपिक का हिस्सा है और भारत में पिछले कुछ वर्षों में तेजी से लोकप्रिय हुआ है।
बीसी-4 कैटेगरी में खेलते हैं जतिन
बोच्चिया में खिलाड़ियों को उनकी शारीरिक स्थिति के आधार पर बीसी-1, बीसी-2, बीसी-3 और बीसी-4 श्रेणियों में बांटा जाता है।
जतिन बीसी-4 वर्ग में खेलते हैं। इस श्रेणी में मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, स्पाइनल कॉर्ड इंजरी और अन्य गंभीर शारीरिक समस्याओं से जूझ रहे खिलाड़ी शामिल होते हैं।
अब लक्ष्य पैरा एशियन गेम्स और पैरालंपिक
जतिन का अगला बड़ा लक्ष्य जापान के नागोया में होने वाले पैरा एशियन गेम्स हैं। इसके अलावा इस वर्ष मिस्र, कजाकिस्तान, कनाडा और अमेरिका में होने वाली प्रतियोगिताओं के लिए भी उन्होंने पंजीकरण कराया है।
उनका सपना सिर्फ पदक जीतना नहीं, बल्कि भारत को 2028 पैरालंपिक में बोच्चिया में मजबूत पहचान दिलाना है।
दिव्यांगों को दिया प्रेरणादायी संदेश
जतिन कहते हैं—
«”खुद को कभी किसी से कम मत समझिए। नेगेटिविटी से दूर रहिए। भगवान ने हर इंसान को कोई न कोई विशेष प्रतिभा दी है। उसी को पहचानिए और पूरे जुनून से आगे बढ़िए। मैंने भी समाज के ताने सुने हैं, मुश्किलें देखी हैं, लेकिन कभी हार नहीं मानी। आप भी जिस क्षेत्र में हैं, वहां ऐसा काम कीजिए कि लोग आपको मिसाल के रूप में याद रखें।”»
क्या है मस्कुलर डिस्ट्रॉफी?
मस्कुलर डिस्ट्रॉफी एक आनुवंशिक (जेनेटिक) बीमारी है, जिसमें शरीर की मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होती जाती हैं। इसके लक्षण अक्सर बचपन से शुरू हो जाते हैं और समय के साथ गंभीर हो सकते हैं। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को चलने-फिरने, उठने-बैठने, संतुलन बनाए रखने और मांसपेशियों में दर्द जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
कौन हैं जतिन कुशवाहा?
आगरा के कमला नगर निवासी जतिन कुशवाहा एक अंतरराष्ट्रीय पैरा बोच्चिया खिलाड़ी हैं। जतन की शादी हो चुकी है जिन पर एक बेटी भी है, उनके पिता तीरथ सिंह कुशवाहा जूते का कारोबार करते हैं। परिवार में दो भाई और दो बहनें हैं, जिनमें जतिन सबसे बड़े हैं। जतिन जन्म से ही मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नाम की बीमारी से पीड़ित हैं। इस बीमारी के कारण उनके शरीर की मांसपेशियां कमजोर हैं और उन्हें चलने-फिरने में भी परेशानी होती है। इसके बावजूद उन्होंने कभी अपनी बीमारी को कमजोरी नहीं माना। वह कहते हैं कि “मेरे लिए यह बीमारी नहीं, बल्कि भगवान का दिया हुआ एक उपहार है।”
जतिन ने कॉमर्स में पोस्ट ग्रेजुएशन, एमबीए और फुटवियर में डिप्लोमा किया है। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने खेल को भी अपना जुनून बनाया। बोच्चिया खेल के बारे में जानकारी मिलने के बाद उन्होंने केवल कुछ दिनों की तैयारी की और पहली ही राष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण और कांस्य पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा दिया। इसके बाद उन्होंने लगातार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन किया। वह बहरीन, चीन, हांगकांग और अब मिस्र में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। बहरीन में उन्होंने कांस्य और रजत पदक जीते, जबकि अब मिस्र में आयोजित वर्ल्ड बोच्चिया चैलेंज सीरीज में कांस्य पदक जीतकर एक बार फिर देश और आगरा का नाम रोशन किया है। जतिन का सपना पैरा एशियन गेम्स और 2028 पैरालंपिक में भारत के लिए पदक जीतना है। उनका कहना है कि कोई भी दिव्यांग व्यक्ति खुद को कमजोर न समझे। यदि मन में विश्वास, मेहनत और आगे बढ़ने का जज्बा हो तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती।
पूरे शहर को है अपने चैंपियन पर गर्व
जतिन कुशवाहा की सफलता पर आरएसओ संजय शर्मा, जिला ओलंपिक संघ के अध्यक्ष डॉ. हरी सिंह यादव, सचिव राहुल पालीवाल, राजीव सोई सहित अनेक खेल अधिकारियों और खिलाड़ियों ने उन्हें शुभकामनाएं दी हैं। परिवार ने बताया कि आगरा लौटने पर उनका भव्य स्वागत किया जाएगा। जतिन कुशवाहा की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि उस अटूट विश्वास की कहानी है जो बताती है कि जीत शरीर की ताकत से नहीं, बल्कि इरादों की मजबूती से हासिल होती है। जिन कदमों को चलने में कठिनाई होती है, वही कदम आज पूरी दुनिया में भारत का तिरंगा बुलंद कर रहे हैं।