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ब्रेस्ट कैंसर सिर्फ शरीर नहीं तोड़ता, कई महिलाओं से छीन लेता है सौंदर्य, मातृत्व, रिश्ते और आत्मविश्वास

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इलाज के बाद भी खत्म नहीं होती जंग, समाज की सोच और टूटते रिश्तों से हर दिन लड़ रही हैं कैंसर सर्वाइवर महिलाएं

ब्रेस्ट कैंसर को अक्सर केवल एक गंभीर बीमारी के रूप में देखा जाता है, लेकिन इससे जूझ चुकी महिलाओं की जिंदगी बताती है कि यह केवल शरीर पर हमला नहीं करता, बल्कि कई बार उनके आत्मसम्मान, रिश्तों, मातृत्व, वैवाहिक जीवन और सामाजिक पहचान को भी गहरे तक प्रभावित कर देता है। इलाज पूरा होने के बाद भी उनकी असली लड़ाई खत्म नहीं होती। उन्हें हर दिन समाज की धारणाओं, टूटते रिश्तों, भेदभाव और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है। देशभर में ब्रेस्ट कैंसर के बढ़ते मामलों के बीच विशेषज्ञों का कहना है कि अब 19 से 20 वर्ष की युवतियों में भी यह बीमारी सामने आ रही है। ऐसे में चिकित्सा के साथ-साथ मानसिक और सामाजिक सहयोग भी उतना ही आवश्यक हो गया है।

मां बनने का सपना रह गया अधूरा

37 वर्षीय एक महिला ने बताया कि शादी के बाद उन्होंने पहले करियर बनाने और फिर परिवार बढ़ाने की योजना बनाई थी। वर्ष 2019 में उन्हें स्टेज-2 ब्रेस्ट कैंसर का पता चला। डॉक्टरों ने बताया कि इलाज के दौरान स्तन निकालना पड़ सकता है और मां बनने की संभावना भी प्रभावित हो सकती है। चार चरण की कीमोथेरेपी और पांच वर्षों तक हार्मोन थेरेपी के बाद वह गर्भवती तो हुईं, लेकिन इलाज के दुष्प्रभावों के कारण गर्भपात हो गया। डॉक्टरों ने आगे भी मां बनने की संभावना बेहद कम बताई। महिला कहती हैं कि परिवार ने कभी उन्हें दोष नहीं दिया, लेकिन आज भी वह खुद को माफ नहीं कर पातीं।

गर्भ में पल रही थी नई जिंदगी, तभी मिला कैंसर का पता

32 वर्षीय महिला पहली बार मां बनने वाली थीं। गर्भावस्था की खुशियों के बीच उन्हें स्तन में गांठ महसूस हुई। जांच में ब्रेस्ट कैंसर की पुष्टि हुई। गर्भावस्था के शुरुआती तीन महीने होने के कारण डॉक्टरों ने कीमोथेरेपी शुरू नहीं की जा सकती थी और गर्भपात की सलाह दी। महिला बताती हैं कि उस कठिन समय में कुछ परिजनों ने यह तक कह दिया कि यदि गर्भ में लड़का है तो एक बार सोच लो, लेकिन लड़की है तो गर्भपात करा दो। उनका कहना है कि उस दिन महसूस हुआ कि कई बार बीमारी से ज्यादा दर्द समाज की सोच देती है।

कीमोथेरेपी से ज्यादा दर्द पति के व्यवहार ने दिया…

42 वर्षीय एक महिला के लिए कैंसर से बड़ा संघर्ष अपना वैवाहिक जीवन बन गया। कीमोथेरेपी के दौरान जब उन्हें पति के सहयोग की सबसे अधिक आवश्यकता थी, तब उन्हें शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। महिला का कहना है कि इलाज के दौरान पति जबरन शारीरिक संबंध बनाने का दबाव डालते थे। विरोध करने पर मारपीट तक होने लगी। उन्होंने बताया कि बीमारी और बदले हुए शारीरिक स्वरूप के कारण वह खुद को दोषी मानने लगी थीं। आखिरकार उन्होंने आत्मसम्मान को प्राथमिकता देते हुए पति से अलग होने का फैसला किया और लोगों से उधार लेकर अपना इलाज पूरा कराया।

कैंसर से जीती, लेकिन रिश्ता हार गई

38 वर्षीय एक अन्य महिला ने बताया कि उनकी शादी तय हो चुकी थी। इसी दौरान जांच में स्टेज-2 ब्रेस्ट कैंसर का पता चला। उन्होंने इलाज कराया और सफल सर्जरी के बाद सामान्य जीवन की ओर लौटने लगीं। परिवार ने बीमारी की जानकारी लड़के वालों से साझा नहीं की थी। कुछ समय बाद जब सर्जरी की जानकारी सामने आई तो लड़के वालों ने रिश्ता तोड़ दिया। महिला कहती हैं कि वह कैंसर से तो जीत गईं, लेकिन अपना रिश्ता नहीं बचा सकीं।

‘बीमारी पहचान नहीं छीनती, समाज की सोच छीन लेती है’

भगवान महावीर कैंसर हॉस्पिटल की साइको-ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. प्रियसी सुरोलिया का कहना है कि आज कम उम्र की युवतियां भी ब्रेस्ट कैंसर का सामना कर रही हैं। इलाज से पहले उनके मन में शादी, पढ़ाई, मातृत्व और समाज में स्वीकार किए जाने को लेकर कई सवाल होते हैं। शादीशुदा महिलाओं की सबसे बड़ी चिंता होती है कि क्या उनका जीवनसाथी पहले जैसा सम्मान और प्यार देगा। उनका कहना है कि बीमारी महिला को कमजोर कर सकती है, लेकिन उसकी पहचान नहीं छीनती। मरीज को दया नहीं, बल्कि सम्मान, सहयोग और संवेदनशील व्यवहार की जरूरत होती है।

वहीं सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. प्रशांत शर्मा के अनुसार, अधिकांश महिलाएं इलाज के बाद शारीरिक रूप से स्वस्थ हो जाती हैं, लेकिन मानसिक और भावनात्मक रूप से लंबे समय तक संघर्ष करती रहती हैं। इसलिए कैंसर मरीजों के साथ-साथ उनके परिवार की काउंसलिंग भी बेहद जरूरी है।

समाज के लिए बड़ा संदेश

ब्रेस्ट कैंसर केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता की भी परीक्षा है। किसी महिला के बाल झड़ जाने, स्तन की सर्जरी होने या मां बनने में कठिनाई आने से उसकी पहचान, सम्मान और अधिकार कम नहीं हो जाते। जरूरत इस बात की है कि परिवार, समाज और जीवनसाथी ऐसे कठिन समय में उसका साथ दें, क्योंकि इलाज दवाइयां कर सकती हैं, लेकिन जीने का हौसला अपनों का विश्वास ही देता है।

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