आगरा। कमिश्नरेट पुलिस इन दिनों अपराधियों से ज्यादा वीआईपी ड्यूटी, त्योहारों, परीक्षाओं, धरना-प्रदर्शनों और बड़े आयोजनों के दबाव में नजर आ रही है। हालत यह है कि पुलिस का बड़ा हिस्सा कानून-व्यवस्था और सुरक्षा ड्यूटी में उलझा रहता है, जबकि अपराधी इसका फायदा उठाकर लगातार वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। ताजा उदाहरण उस समय सामने आया, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आगरा दौरे पर थे और पुलिस का पूरा फोकस वीआईपी सुरक्षा पर था। उसी दौरान जिस थाना क्षेत्र में मुख्यमंत्री मौजूद थे, उसी थाना क्षेत्र में चोरी की वारदात हो गई। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि महज सात दिन के भीतर थाने के सामने और थाने के बगल में दो दुस्साहसिक चोरियां हो गईं। इससे पहले भीमसैन वैजनाथ मिष्ठान भंडार को चोरों ने निशाना बनाया था। दुकान मालिक योगेंद्र सिंघल के मुताबिक चोर ₹20 हजार की नकदी, चांदी के सिक्के, 10 से 15 किलो मिठाई और सीसीटीवी कैमरों की डीवीआर भी अपने साथ ले गए। दूसरी वारदात भी थाने के आसपास ही हुई। दोनों घटनाओं में ताला तोड़ने का तरीका और डीवीआर चोरी होने का तरीका एक जैसा है, जिससे आशंका है कि एक ही संगठित गिरोह लगातार पुलिस को चुनौती दे रहा है। जब थाने के सामने और थाने के बगल की दुकानें ही सुरक्षित नहीं हैं, तो शहर के बाकी इलाकों की सुरक्षा का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। लगातार दो वारदातों ने रात्रि गश्त और अपराध नियंत्रण की रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कमिश्नरेट व्यवस्था लागू हुए साढ़े तीन वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन आज भी अपराध नियंत्रण और कानून-व्यवस्था के लिए अलग पुलिस बल उपलब्ध नहीं कराया गया है। नतीजा यह है कि एक ही पुलिस बल को अपराध रोकने, विवेचना करने, वीआईपी सुरक्षा देने, त्योहारों की ड्यूटी निभाने, ट्रैफिक संभालने और आंदोलनों से निपटने जैसी तमाम जिम्मेदारियां निभानी पड़ रही हैं। आंकड़ों के अनुसार 1 जनवरी 2026 से 15 जुलाई 2026 तक सिर्फ 196 दिनों में सिटी जोन में 283 बड़े आयोजन हुए। इनमें त्योहार शामिल नहीं हैं। इसी दौरान 18 से अधिक वीआईपी मूवमेंट हुए, जिनमें मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, विदेशी प्रतिनिधिमंडल और अन्य विशिष्ट अतिथियों की सुरक्षा में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात रहे। इसके अलावा होली, ईद, मोहर्रम, महाशिवरात्रि, गणतंत्र दिवस, पुलिस भर्ती परीक्षा, नीट, बीएड सहित कई प्रतियोगी परीक्षाओं, किसान आंदोलनों, अधिवक्ताओं के प्रदर्शन, छात्र आंदोलनों और राजनीतिक कार्यक्रमों में भी पुलिस की भारी तैनाती रही।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब पुलिस का अधिकांश समय वीआईपी सुरक्षा और आयोजनों में बीत जाएगा, तो अपराधियों पर शिकंजा कौन कसेगा? थाने के सामने और थाने के बगल में लगातार हुई चोरियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अपराधी पुलिस की व्यस्तता का फायदा उठा रहे हैं। ऐसे में कमिश्नरेट में अपराध नियंत्रण के लिए अलग फोर्स और अतिरिक्त पुलिस बल की मांग पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई है।