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शक, सनक और दोहरा कत्ल… आखिरकार मिला इंसाफ: बेटी से शक्ल न मिलने पर पिता को उम्रकैद

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खंदौली के चर्चित मां-बेटी हत्याकांड में अदालत का बड़ा फैसला, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों ने दिलाई सजा

आगरा। 

वर्ष 2022 में खंदौली थाना क्षेत्र के पैंतखेड़ा गांव में हुए सनसनीखेज मां-बेटी हत्याकांड में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी पति मनमोहन को आजीवन कारावास और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। पत्नी के चरित्र पर संदेह और एक वर्षीय बेटी की शक्ल खुद से न मिलने के भ्रम में आरोपी ने अपनी पत्नी ममता देवी (27) और मासूम बेटी सौम्या (1 वर्ष) की बेरहमी से हत्या कर दी थी। इस मामले की सबसे अहम बात यह रही कि मुकदमे के दौरान कई गवाह अपने बयान से मुकर गए, लेकिन फोरेंसिक रिपोर्ट, घटना में प्रयुक्त कांच के टुकड़े की बरामदगी, पुलिस जांच और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को अदालत ने इतना मजबूत माना कि आरोपी को दोषी करार देते हुए कठोर सजा सुनाई।

पत्नी पर शक, बेटी पर भी उठाया सवाल

मृतका के पिता बलवीर सिंह, निवासी धर्मपुरा (मथुरा), ने वर्ष 2022 में थाना खंदौली में दर्ज कराई रिपोर्ट में बताया था कि उनकी बेटी ममता की शादी 26 जनवरी 2016 को मनमोहन से हुई थी। दंपती के दो बच्चे थे—पांच वर्षीय बेटा आरव और एक वर्षीय बेटी सौम्या। परिजनों के मुताबिक आरोपी अक्सर पत्नी पर चरित्रहीनता का आरोप लगाकर मारपीट करता था। उसे यह भी संदेह था कि बेटी सौम्या की शक्ल उससे नहीं मिलती, जिससे विवाद लगातार बढ़ता गया।

पहले पत्नी, फिर मासूम बेटी की हत्या

जांच में सामने आया कि 9-10 अक्टूबर 2022 की रात आरोपी ने पहले पत्नी ममता का गला दबाकर और मारपीट कर हत्या कर दी। इसी दौरान शीशा टूट गया, जिसके कांच के टुकड़े से उसने पत्नी के गले पर वार भी किया। हत्या के दौरान जाग गई एक वर्षीय बेटी सौम्या को भी आरोपी ने गला और मुंह दबाकर मौत के घाट उतार दिया, ताकि घटना का कोई गवाह न बचे। पुलिस ने 13 अक्टूबर 2022 को आरोपी को गिरफ्तार किया। पूछताछ में उसने वारदात स्वीकार करते हुए घटना में प्रयुक्त कांच के टुकड़े की बरामदगी भी कराई।

‘बंदरों के हमले’ की कहानी नहीं बचा सकी आरोपी को…

मुकदमे के दौरान बचाव पक्ष ने हत्या को बंदरों के हमले से जोड़ने का प्रयास किया, लेकिन अदालत ने उपलब्ध वैज्ञानिक एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर इस दलील को खारिज कर दिया। अभियोजन पक्ष की ओर से एडीजीसी हेमंत दीक्षित ने अदालत में कई गवाह और साक्ष्य पेश किए। हालांकि कई गवाह पक्षद्रोही हो गए, लेकिन अदालत ने माना कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी पूरी तरह स्थापित होती है और आरोपी के अपराध की पुष्टि करती है।

मायके में पहले ही बताई थी प्रताड़ना

मृतका के चाचा पूरन सिंह ने अदालत में बताया कि रक्षाबंधन पर ममता बच्चों के साथ मायके आई थी। उस दौरान उसने परिवार को बताया था कि पति बेटी की शक्ल को लेकर उस पर शक करता है और आए दिन मारपीट करता है। यही बयान अदालत के लिए अहम परिस्थितिजन्य साक्ष्यों में शामिल रहा।

अनाथ हुए बेटे आरव की मदद के निर्देश

फैसले में अदालत ने जिलाधिकारी को निर्देश दिया कि मृतका के बेटे आरव को नियमों के अनुसार उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना का लाभ दिलाया जाए तथा उसकी शिक्षा के लिए राज्य संचालित आवासीय विद्यालय में प्रवेश दिलाने पर भी विचार किया जाए। साथ ही अदालत ने आदेश दिया कि आरोपी पर लगाए गए एक लाख रुपये जुर्माने की 80 प्रतिशत राशि आरव के नाम बैंक खाते में जमा कराई जाए।

मनुस्मृति का हवाला देते हुए अदालत की अहम टिप्पणी

निर्णय सुनाते हुए अदालत ने कहा कि कोई भी अपराध ऐसा नहीं होता जिसके बाद कोई साक्ष्य शेष न बचे। फैसले में मनुस्मृति का उल्लेख करते हुए कहा गया कि अपराधी भले ही यह समझे कि उसे किसी ने नहीं देखा, लेकिन उसके कर्मों के प्रमाण अंततः सामने आ ही जाते हैं। इसी आधार पर अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में प्रत्यक्षदर्शी गवाह कमजोर पड़ने के बावजूद परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की मजबूत श्रृंखला ने आरोपी का अपराध सिद्ध कर दिया और वही उसकी सजा का आधार बनी।

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