एलआईयू को पता चल गया, मगर स्थानीय पुलिस क्यों रही बेखबर? अब पूरे शहर के कैफे और मिनी मूवी सेंटरों पर उठे सवाल…
आगरा।
शहर के चर्चित नंद प्लाजा में पुलिस की बड़ी कार्रवाई ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस का आरोप है कि यहां कैफे और मिनी मूवी सेंटरों की आड़ में अनैतिक व्यापार संचालित किया जा रहा था। एलआईयू और मुखबिर से मिली सूचना के बाद एसीपी ताज सुरक्षा के नेतृत्व में थाना ताजगंज और एकता पुलिस की संयुक्त टीम ने छापा मारकर पुष्पेंद्र सिंह, शोएब, अनुज शर्मा और भूपेंद्र कुमार दिवाकर को गिरफ्तार किया। मामले में नरेन्द्र सिंह, रविन्द्र और सौरभ यादव अभी फरार बताए गए हैं।
पुलिस के मुताबिक, कार्रवाई के दौरान तीन मोबाइल फोन, 3,950 रुपये नकद, 12 चाबियां, दो क्यूआर कोड और कैफे के अंदर से निरोध के कई पैकेट बरामद किए गए। थाना सदर बाजार में अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की धाराओं 3, 4, 5 और 7 के तहत मुकदमा दर्ज कर चारों आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया।
एलआईयू को भनक लग गई, स्थानीय पुलिस को क्यों नहीं?
इस कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल स्थानीय पुलिस की भूमिका को लेकर उठ रहा है। जिस नंद प्लाजा में छापा पड़ा, वह कोई सुनसान इलाका नहीं बल्कि शहर के व्यस्त मुख्य मार्ग पर स्थित व्यावसायिक परिसर है। सदर एसीपी कार्यालय सौदागर लाइन में है और सदर थाना भी ज्यादा दूर नहीं है। ऐसे में लोगों का सवाल है कि जब एलआईयू तक सूचना पहुंच गई तो स्थानीय पुलिस को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली?
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस परिसर में लंबे समय से कई कैफे और मिनी मूवी सेंटर चल रहे थे। सुबह से देर रात तक यहां युवाओं की आवाजाही रहती थी। आरोप हैं कि कुछ जगहों पर निजी केबिन किराये पर उपलब्ध कराए जाते थे। यदि ऐसी गतिविधियां लंबे समय से चल रही थीं, तो क्या कभी निरीक्षण नहीं हुआ? क्या शिकायतें नहीं मिलीं, या फिर शिकायतों पर कार्रवाई नहीं की गई?
क्या सिर्फ नंद प्लाजा ही जांच के दायरे में रहेगा?
नंद प्लाजा पर कार्रवाई के बाद अब पूरे शहर में चल रहे ऐसे कैफे और मिनी मूवी सेंटर चर्चा में हैं। लोगों का कहना है कि शहर के कई इलाकों में इसी तरह के प्रतिष्ठान खुलेआम संचालित हो रहे हैं। इनमें से कई सोशल मीडिया पर इंस्टाग्राम और फेसबुक के जरिए लगातार प्रचार करते हैं। निजी केबिन, कपल स्पेस और अन्य सुविधाओं के नाम पर खुलेआम विज्ञापन किए जाते हैं। अब सवाल उठ रहा है कि जब यह प्रचार सबके सामने है, तो संबंधित विभागों की नजर इन प्रतिष्ठानों तक क्यों नहीं पहुंची? क्या इनका समय-समय पर सत्यापन होता है? यदि होता है तो फिर ऐसी शिकायतें सामने कैसे आती हैं?
2004 की कार्रवाई फिर याद आई
यह पहला मामला नहीं है। वर्ष 2004 में भी संजय प्लेस के एक साइबर कैफे में बंद केबिन मिलने पर पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की थी। उस समय ऐसे बंद केबिनों पर सख्ती की गई थी। समय के साथ साइबर कैफे की जगह ई-लाइब्रेरी, कैफे और मिनी मूवी सेंटर आ गए, लेकिन बंद केबिनों की व्यवस्था फिर दिखाई देने लगी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या पुराने अनुभवों से कोई सबक नहीं लिया गया?
पूरे शहर में सर्वे की उठी मांग
कार्रवाई के बाद स्थानीय व्यापारियों और लोगों का कहना है कि जांच केवल एक परिसर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पूरे शहर में संचालित ऐसे कैफे और मिनी मूवी सेंटरों का संयुक्त सर्वे कराया जाए। जहां नियमों का पालन हो रहा है, वहां किसी तरह की परेशानी न हो, लेकिन जहां नियमों का उल्लंघन या अवैध गतिविधियों की शिकायत मिले, वहां निष्पक्ष और सख्त कार्रवाई हो।
सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी
नंद प्लाजा की कार्रवाई ने एक नई बहस छेड़ दी है। अब लोगों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसे कैफे और मिनी मूवी सेंटर किन नियमों के तहत संचालित हो रहे हैं? इनके पास किस तरह के लाइसेंस और अनुमति हैं? क्या संबंधित विभाग समय-समय पर इनकी जांच करता है? और यदि सब कुछ नियमानुसार है तो फिर इतनी बड़ी कार्रवाई की नौबत क्यों आई?
फिलहाल पुलिस ने चार आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है और तीन अन्य आरोपियों की तलाश जारी है। वहीं पूरे शहर की नजर अब इस बात पर है कि प्रशासन की अगली कार्रवाई सिर्फ नंद प्लाजा तक सीमित रहती है या फिर शहरभर में ऐसे प्रतिष्ठानों की व्यापक जांच शुरू होती है।